July 12, 2009

बापू के जीवन का दर्पण 'सेवाग्राम आश्रम'

यहाँ के कण-कण में है बापू का जीवनदर्शन

सचिन शर्मा
महात्मा गाँधी का साबरमती आश्रम (गुजरात) दुनिया भर में प्रसिद्ध है। लेकिन उतना ही प्रसिद्ध उनका सेवाग्राम आश्रम भी है जो वर्धा(महाराष्ट्र) में स्थित है। इस आश्रम की खासियत यह है कि गाँधीजी ने अपने संध्याकाल के अंतिम 12 वर्ष यहीं बिताए। वर्धा शहर से 8 किमी की दूरी पर 300 एकड़ की भूमि पर फैला यह आश्रम इतनी आत्मिक शांति देता है जिसको आप शब्दों में नहीं पिरो सकते। इस आश्रम की कई खासियत हैं। गाँधीजी ने यहाँ कई रणनीति बनाईं, कईयों से मिले और बहुतों के जीवन को नई दिशा दी। यहाँ आकर ऐसा लगता है जैसे आप किसी मंदिर में पहुँच गए हों। सबकुछ शांत और सौम्य। आश्रम को समझने पर गाँधीजी का व्यक्तित्व भी आप ही समझ आ जाता है। यह आश्रम बापू के व्यक्तित्व का दर्पण है। यहाँ आकर ही पता चल जाता है कि हम एक ऐसे महान शख्स का उठना-बैठना देख-समझ रहे हैं जिसने भारत की आजादी का नींव रखी। तो आइए देखते हैं कि कैसे हुई 'सेवाग्राम आश्रम' की स्थापना और नजर डालते हैं उसके इतिहास पर।

साबरमती से सेवाग्राम :
गाँधीजी के साबरमती से सेवाग्राम पहुँचने की कहानी भी काफी रोचक है। 12 मार्च 1930 को प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह के लिए साबरमती आश्रम से अपने 78 साथियों के साथ गाँधीजी 'दांडी यात्रा' पर निकले थे। वहाँ से चलते समय उन्होंने संकल्प लिया था कि स्वराज्य लिए बिना आश्रम में नहीं लौटूँगा। 6 अप्रेल 1930 को गुजरात के दांडी समुद्र तट पर गाँधीजी ने नमक का कानून तोड़ा और 5 मई 1930 को उन्हें गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाए यरवदा जेल में डाल दिया गया। 1933 में जेल से रिहा होने के बाद गाँधीजी देश व्यापी हरिजन यात्रा पर निकल गए। स्वराज्य मिला नहीं था इसलिए वे वापस साबरमती लौट नहीं सकते थे। अतः उन्होंने मध्य भारत के एक गाँव को अपना मुख्यालय बनाने का निश्चय किया। 1934 में जमनालाल बजाज एवं अन्य साथियों के आग्रह से वे वर्धा आए और मगनवाड़ी में रहने लगे। 30 अप्रेल 1936 को गाँधीजी पहली बार मगनवाड़ी से सेगाँव (सेवाग्राम) रहने चले आए। जिस दिन वे सेवाग्राम आए उन्होंने वहाँ छोटा सा भाषण देकर सेवाग्राम में बस जाने का अपना निश्चय गाँववालों को बताया।

यूँ हुआ सेवाग्राम का नामकरण :
आज के सेवाग्राम का नाम शुरू में सेगाँव था। इसी क्षेत्र में नागपुर-भुसावल रेलवे लाइन पर शेगाँव नाम के रेलवे स्टेशन वाला एक बड़ा गाँव होने से गाँधीजी की डाक में बहुत गड़बड़ी होती थी। अतः सुविधा के लिए 1940 में गाँधीजी की इच्छा एवं सलाह से 'सेगाँव' का नाम 'सेवाग्राम' कर दिया गया।

सेवाग्राम में विभिन्न कुटियाएँ :
सेवाग्राम में कई कुटियाएँ हैं जहाँ स्वयं गाँधीजी एवं उनके सहयोगी रहा करते थे। यह सब कुटिया अपने आप में अनोखी हैं और गाँधीजी की तत्कालीन जीवनशैली समेटी हुई हैं। उनका विवरण इस प्रकार है।

आदि निवास : यहाँ शुरुआत में गाँधीजी समेत सभी लोग रहा करते थे। तब यही एकमात्र कुटी थी। यहाँ बा-बापू के अलावा प्यारेलाल जी, संत तुकड़ोजी महाराज, खान अब्दुल गफ्फार खाँ के साथ दूसरे आश्रमवासी तथा मेहमान ठहरते थे। गाँधीजी से मिलने आने आने वाले सब नेता भी उनसे यहीं मिलते थे। 'भारत छोड़ो आंदोलन' की प्रथम सभा 1942 को इसी जगह हुई थी। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह की प्राथमिक तैयारी भी इसी जगह हुई थी।

बापू कुटी और बापू दफ्तर : इन दोनों कुटियों में गाँधीजी रहते थे तथा लोगों से मिलते थे। बापू कुटी और बापू दफ्तर बाद में बनी। आज जैसी ये दिखती हैं पहले इसके मुकाबले यह कहीं अधिक छोटी थीं। बापू दफ्तर वाली कुटी में गाँधीजी लोगों से मंत्रणा करते थे। उनकी मदद करने वाले लोग उनके दाएँ ओर बैठते थे। महादेवभाई या दूसरे मंत्री उनकी बाईं ओर बैठते थे।

बा- कुटी : आश्रम में अनेक पुरुषों का रहना तथा आना-जाना होता था। इस वजह से बा की परेशानी को देखते हुए जमनालाल बजाज ने बा की सहमति से उनके लिए एक अलग कुटी बनवा दी। आज वह बा- कुटी के नाम से जानी जाती है।

आखिरी निवास : यह कुटी जमनालाल बजाज ने स्वयं के रहने के लिए बनवाई थी। लेकिन ऐसा अवसर ना आ सका। यह कुटी अन्य कई मेहमानों के रहने के काम में आती रही।

प्रार्थना भूमि : यह आश्रम के बीचोंबीच एक बड़ी भूमि है जो प्रार्थना के लिए काम आती थी। इसपर आज भी प्राथर्ना होती है।

इन कुछ प्रमुख कुटियों और स्थानों के अलावा भी यहाँ कई स्थान हैं। इनमें महादेव कुटी, भोजन स्थान, रसोई घर, किशोर निवास, परचुरे कुटी, रुस्तम भवन, नई तालीम परिसर, गौशाला, अंतरराष्ट्रीय छात्रावास, डाकघर, यात्री निवास शामिल हैं।

गाँधी चित्र प्रदर्शनी :
आश्रम के पश्चिम में, मुख्य सड़क के उस पार स्थित गाँधी चित्र प्रदर्शनी में बापू का संपूर्ण जीवनक्रम चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। यह चित्र प्रदर्शनी काफी अद्भुत है और इसे जरूर देखा जाना चाहिए। इसे देखते समय बापू का पूरा जीवन आपके सामने जीवन्त हो उठेगा।

यहाँ चित्रों के अतिरिक्त बापू के जीवन में घटित घटनाओं को मूर्तियों द्वारा तथा उनके आवास आदि को प्रतिकृति के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। इससे बापू के जीवनक्रम व कार्य को समझने व जानने में बहुत आसानी होती है।

सेवाग्राम सेवकों के लिए :
गाँधीजी एक पोथी में समय-समय पर आश्रमवासियों के लिए सूचनाएँ लिख कर रखा करते थे। पोथी के प्रारंभ में लिखा रहता था - 'सेगाँव सेवकों के लिए'। इस पोथी में बहुत ही अद्भुत बातें लिखी रहती थीं जो अनुकरणीय हैं। पेश हैं उनमें से कुछ बातें..
यह बात हम ध्यान रखें

- थूक भी मल है। इसलिए जिस जगह हम थूकें या मैले हाथ धोवें वहाँ बर्तन कभी साफ ना करें।
(दिनांक : 6.8.1936)
- मेरी सलाह है कि सब नियमपूर्वक सूत्रयज्ञ करें। उस बात में हमें बहुत सावधान रहना चाहिए।
(दिनांक 6.1.1940)
- सब काम सावधानी से होना चाहिए, हम सब एक कुटुम्ब हैं, इसी भावना से काम लेना आवश्यक है। ( दिनांक : 21.1.1940)
- नमक भी चाहिए उतना ही लेवें। पानी तक निकम्मा खर्च न करें। मैं आशा करता हूँ कि सब (लोग) आश्रम की हर एक चीज अपनी और गरीब की है ऐसा समझकर चलेंगे।
(दिनांक : 30.1.1940)

हम यह कैसे कह सकते हैं कि सेवाग्राम आश्रम मात्र को देखने से हम बापू और उनके जीवन को समझ सकते हैं। तो स्वयं गाँधीजी ने इस बारे में लिखा है।
यहाँ रहते एक बार महात्मा गाँधी ने कहा था, 'मेरा जीवन ही मेरा संदेश है'...सेवाग्राम में रहते हुए 1937 में उन्होंने कहा था..

' आप यह विश्वास रखें कि मैं जिस तरह से रहना चाहता हूँ ठीक उसी तरह से आज रह रहा हूँ। जीवन के प्रारंभ में ही अगर मुझे अधिक स्पष्ट दर्शन होता तो मैं शायद जो करता वह अब जीवन के संध्याकाल में कर रहा हूँ। यह मेरे जीवन की अंतिम अवस्था है। मैं तो नींव से निर्माण करके ऊपर तक जाने के प्रयास में लगा हूँ। मैं क्या हूँ, यह यदि आप जानना चाहते हैं तो मेरा यहाँ (सेवाग्राम) का जीवन आप देखिए तथा यहाँ के वातावरण का अध्ययन कीजिए। '

अगर वाकई कोई गाँधीजी को, उनके दर्शन को और उनके जीवन को समझना चाहता है तो उसे सेवाग्राम आश्रम जाकर जरूर देखना चाहिए। वहाँ अब भी चरखे पर सूत काता जाता है। पारंपरिकता वहाँ जीवन्त है। स्वयं गाँधीजी भी वहाँ जीवन्त हैं। आश्रम देखकर सहसा विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि कोई महान पुरुष इस सादगी से भी रह सकता है।

तभी तो अल्बर्ट आइन्सटीन ने एक बार गाँधीजी के बारे में कहा था - 'मैं गाँधी को हमारे युग का एकमात्र सच्चा महापुरुष मानता हूँ। आने वाली पीढ़ियाँ कठिनाई से यह विश्वास कर पाएँगी कि गाँधी जैसा हाड़-माँस का बना व्यक्ति सचमुच इस धरती पर कभी टहलता था।'

July 09, 2009

'सरिस्का' से भी नहीं लिया सबक



पन्ना प्रकरण में मध्यप्रदेश के वन विभाग ने झूठ बोला

सचिन शर्मा
मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व से बाघों का पूरी तरह सफाया हो चुका है। यह बात अब कई सरकारी एवं गैर सरकारी जाँच एजेंसियों ने अपनी रिपोर्टों में पुष्ट कर दी है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा गठित विशेष जाँच टीम की रिपोर्ट आने के बाद तो अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में अब एक भी बाघ नहीं बचा है। इस जाँच टीम ने इस बात का भी खुलासा किया है कि पन्ना में वर्ष 2002 और 2005 के बीच सर्वाधिक बाघों का शिकार हुआ। बाघों के शिकार का यह सिलसिला जनवरी 2009 तक जारी रहा जब तक पन्ना का अंतिम बाघ बचा था।

पन्ना में बाघों के गायब होने तक एक बाघ विशेषज्ञ चिल्ला-चिल्लाकर कहता रहा कि यहाँ बाघों का अस्तित्व खतरे में है और उन्हें बचाए जाने के लिए जल्दी ही कुछ किया जाना चाहिए, लेकिन उस विशेषज्ञ की बात पर मध्यप्रदेश के वन विभाग ने कोई कान नहीं धरा। यहाँ बात हो रही है बाघ विशेषज्ञ डॉ. रघु चुंडावत की। इनकी 'द मिसिंग टाइगर आफ पन्ना' नामक रिपोर्ट को भी पार्क के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा अनदेखा किया गया और अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए बाघों की संख्या के अतिरंजित आँकड़े पेश किए गए। इस पूरे प्रकरण ने सरिस्का की याद ताजा कर दी।

चार साल पहले वहाँ गायब हुए बाघों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा खड़ा हुआ था। उस मामले ने इतना तूल पकड़ा था कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खुद रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान आए थे और उन्होंने पूरे देश के सभी प्रदेशों के वन विभागों के प्रमुखों से इस संबंध में बात की थी। उस दौरान ही राष्ट्रीय स्तर पर 'टाइगर टास्क फोर्स' का गठन हुआ था, जिसका नेतृत्व सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट) प्रमुख सुनीता नारायण को सौंपा गया था। बाद में उस समिति ने अपनी बहुचर्चित रिपोर्ट 'जोइनिंग द डाट्स' केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी थी। उस रिपोर्ट में हर उस बात का उल्लेख था जो बाघों के खत्म होने के पीछे कारण बनी थी और हर उस बात का उल्लेख भी था जिसे अपनाकर बाघों को बचाया जा सकता था। यह रिपोर्ट आज भी सीएसई की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इतना ही नहीं इस रिपोर्ट को भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून की वेबसाइट पर जाकर भी पढ़ा जा सकता है।

यहाँ सरिस्का का उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि वो देश की पहली ऐसी बाघ परियोजना (प्रोजेक्ट टाइगर) है, जहाँ बाघ शिकार के कारण खत्म हो गए थे। उसके बाद राजस्थान के दूसरे प्रोजेक्ट टाइगर रणथम्भौर में भी कमोबेश यही स्थिति बनी। हालाँकि वहाँ बाघ खत्म नहीं हुए थे, लेकिन उनकी संख्या 47 से घटकर मात्र 21 रह गई थी। यानी आधी से भी कम।रणथम्भौर में बाघ कम होने वाली बात भी सबसे पहले अक्टूबर 2004 में इस लेखक ने ही उठाई थी। उन 3-4 सालों में देखा गया कि कैसे वन विभाग के अधिकारी आँकड़ों की हेरा-फेरी करके जनता की आँखों में धूल झोंकते रहते हैं। पर्यटकों को यह पता ही नहीं चलता कि उन्हें जो आँकड़े बताए जा रहे हैं असलियत में बाघ उससे बहुत कम संख्या में बचे हैं।

पन्ना प्रकरण के सामने आने के बाद तो ऐसा लगा कि इतिहास ने अपने को दोहरा दिया है। वही गलतियाँ फिर से हुईं। वन विभाग के अधिकारियों ने इन दोनों प्रकरणों में सिर्फ झूठ बोला। बाघ दिखाई नहीं देने के बाद भी सिर्फ यही बताया गया कि बाघ इस जंगल में हैं और उनकी संख्या बढ़ रही है। रणथम्भौर प्रकरण के दौरान वहाँ के प्रसिद्ध बाघ विशेषज्ञ फतेहसिंह राठौड़ की संस्था 'टाइगर वॉच' ने कई बार वहाँ के वन विभाग को चेताया था कि यहाँ बाघों का शिकार हो रहा है, लेकिन अधिकारियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। आखिर जब मीडिया में इस विषय संबंधी खबरें छपीं तब वसुंधरा राजे की तत्कालीन सरकार की नींद खुली और उसने टाइगर टास्क फोर्स का गठन किया। इस समिति ने भारतीय वन्यजीव संस्थान की मदद से रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की गिनती करवाई जो आश्चर्यजनक रूप से कम निकली।

अब सरिस्का और रणथम्भौर की तरह ही पन्ना का भी हाल हुआ है और मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की नींद भी तब जाकर खुली है, जब पन्ना टाइगर रिजर्व के सभी बाघों का शिकार हो गया है। अब पन्ना में भी भारतीय वन्यजीव संस्थान की मदद से इस पूरे प्रकरण को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है। कान्हा तथा बाँधवगढ़ से बाघ-बाघिनों को लाए जाने की योजना बनाई जा रही है। दो बाघिनें वहाँ लाई भी जा चुकी हैं, लेकिन बाघ ना होने की वजह से वो 'मेटिंग सीजन' होने के बावजूद भी प्रजनन करने में समर्थ नहीं हैं। 'प्रोजेक्ट टाइगर' के अनुसार देश में बाघों की हालत खस्ता है। उसकी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन सालों में 100 से ज्यादा बाघ मारे गए हैं, जिनमें से आधे तो इसी साल (2009) में मारे गए हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों के वन विभागों ने इतने पर भी अपना ढर्रा नहीं बदला और झूठ बोलना जारी रखा तो हमारे देश का राष्ट्रीय पशु एक दिन खत्म हो जाएगा। अगर देश में 'सरिस्का' बार-बार यूँ ही दोहराए जाते रहे तो सभी योजनाएँ धरी की धरी रह जाएँगी।

सरकारों को वन विभाग के दावों की किसी गैर सरकारी संगठन या स्वायत्त संस्था से पुष्टि कराते रहनी चाहिए ताकि वन विभाग झूठे आँकड़े पेश करने से पहले कई बार सोच ले। सरकार को 'वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट' और उसके अंतर्गत होने वाली सजाओं को भी सख्ती से लागू करना चाहिए ताकि बाघों तथा अन्य वन्यजीवों की हत्या करने वालों को यह पता चल जाए कि वो एक जघन्य कृत्य कर रहे हैं और उसकी उन्हें सख्त सजा मिलेगी। अगर प्रदेश सरकारें यह सख्त रवैया अपनाएँगी तभी वे अपने यहाँ के जंगलों और उनमें रहने वाले वन्यजीवों को बचा पाएँगी। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो देश के जंगलों में वन्यजीव आँकड़ों में तो जीवित दिखेंगे, लेकिन असलियत में नहीं।

June 05, 2009

घटते जंगल, बढ़ती मुसीबतें

विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर विशेष


सचिन शर्मा
पिछले वर्ष जब भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने अपनी जाँच रिपोर्ट में खुलासा करते हुए बताया था कि भारत के इतिहास में बाघों की सबसे कम संख्या इस बार दर्ज की गई है तो इस बात पर विशेषज्ञों को जरा सा भी आश्चर्य नहीं हुआ था। इसके अपने कारण भी थे। देश में जिस तरह की स्थितियाँ निर्मित हो रही हैं उसमें बाघ ही नहीं बल्कि सभी वन्यजीवों की स्थिति खतरे में है।

कांग्रेस सरकार अपने पिछले कार्यकाल में जिस 'ट्राइबिल बिल' को पारित करके अपनी पीठ ठोंक रही है वही बिल बाघों और जंगलों के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हो रहा है। 'फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट बताती है कि भारत में जंगल तेजी से कम हो रहे हैं और भविष्य में ये मौसम परिवर्तन और वन्यजीवों के हिसाब से खतरनाक साबित होंगे।

तेज बढ़ती गर्मी और मौसम परिवर्तन सिर्फ योरपीय या अमेरिकी देशों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है। भारत भी इसकी चपेट में है और लगातार कम हो रही वर्षा तथा दिनोंदिन तेजी से बढ़ रही गर्मी यह बता रही है कि यह हमारे लिए भी उतनी ही चिंता का विषय है। लेकिन अभी भी लोग इस समस्या के मूल में जाने से बच रहे हैं। विकास की कीमत भारत भी चुका रहा है। तेजी से बढ़ रहे शहर जंगल की भूमि लील रहे हैं और देश में 'फॉरेस्ट कवर' निरंतर कम हो रहा है।

देश के जंगलों के बढ़ने-घटने का हिसाब रखने वाले 'फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पाँच वर्षों में भारत में बनने वाले बड़े बाँधों और सुनामी के कहर से 728 वर्ग किलोमीटर जंगली क्षेत्र पूर्णतः नष्ट हो गया। सिर्फ 2003 और 2005 के मध्य में ही 1409 वर्ग किमी जंगल क्षेत्र नष्ट हुआ था। एक समय जहाँ भारत में 50 प्रतिशत से भी अधिक जंगल थे वहीं बाद में ये अपने सबसे निम्नतम स्तर यानी घटकर 20 प्रतिशत के आस-पास पहुँच गए।

भारत सरकार ने विशेषज्ञों की सलाह पर इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और अपनी दसवीं पंचवर्षीय योजना में भारत में फॉरेस्ट कवर को 25 प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा। यह योजना 2007-08 में खत्म हो गई लेकिन सरकार अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई। इसके बाद केन्द्र सरकार ने 11 वीं पंचवर्षीय योजना को लागू किया और इसमें फॉरेस्ट कवर को 33 प्रतिशत करने का लक्ष्‌य रखा। उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से किसी भी देश के कुल भू-भाग का 33 प्रतिशत जंगलों से आच्छादित होना चाहिए।

इस बारे में पिछली केन्द्र सरकार में वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री रहे एस. रघुपति ने दावा भी कर दिया था कि 2012 तक हम देश के फॉरेस्ट कवर को 30 प्रतिशत तक ले जाएँगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया और आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार देश में अभी भी फॉरेस्ट कवर मात्र 23 प्रतिशत है जो आदर्श स्थिति से पूरा 10 प्रतिशत कम है।

'द स्टेट ऑफ इंडियन फॉरेस्ट्स' की रिपोर्ट के अनुसार भारत के जंगलों में 6218 मिलीयन घन मीटर लकड़ी का संग्रह है। इस संग्रह को सब अपने-अपने तरीके से और जल्द से जल्द इस्तेमाल करने की सोच रहे हैं लेकिन कोई भी प्रकृति और पर्यावरण के बारे में नहीं सोच रहा। नजीजतन ग्लोबल वार्मिंग की मार दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और भारत से वन्यजीवों की कई प्रजातियाँ खत्म हो रही हैं, क्योंकि उनके आशियाने जंगल धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं।

उक्त रिपोर्ट के अनुसार अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और हरे-भरे इलाकों में भी 1 लाख 83 हजार 135 वर्ग किमी क्षेत्र में जंगल नहीं हैं। भारत के जंगलों का सबसे बड़ा प्रतिशत हमालयी क्षेत्र में है जहाँ कुल भू-भाग के 54 प्रतिशत क्षेत्र पर जंगल हैं। इनमें वो पूर्वोत्तर राज्य भी शामिल हैं जहाँ बहुतायत में जंगल हैं। ये हमारे देश के फैंफड़े साबित हो रहे हैं। लेकिन मैदानी इलाकों में जंगल तेजी से घट रहे हैं। जहाँ भी आबादी बढ़ रही है वहाँ जंगल और जानवर दोनों कम हो रहे हैं। इंसान अपने वजूद के सामने बाकी सबके वजूद को नकार रहा है। अगर जंगलों को बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया गया तो हमारा साँस लेना मुश्किल हो जाएगा, यह तय है।

कितने प्रकार के होते हैं जंगल?
1. सघन (डेंस फॉरेस्ट)- यह ऐसा जंगल होता है जिसमें धरती भी मुश्किल से ही दिखती है। यह जंगल प्रकृति द्वारा हमें प्रदत्त फैंफड़े की तरह होते हैं जो कारबनडाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैस को सोखकर जीवनदायिनी ऑक्सीजन उत्सर्जित करते हैं। ये बादलों को आकर्षित करके बारिश के भी कारक बनते हैं। ये ज्यादातर ऐसी जगहों पर होते हैं जहाँ इंसानी दखलंदाजी ना के बराबर होती है।

2. सामान्य (मोरडरेट फॉरेस्ट)- ये सामान्य प्रकार के जंगल राष्ट्रीय उद्यानों या रिजर्व फॉरेस्ट में मिलते हैं। यहाँ इंसानी दखलदांजी एक सीमा तक ही मान्य रहती है।

3. खुला जंगल (ओपन फॉरेस्ट)- ऐसे जंगल शहरी क्षेत्रों में होते हैं और शहर के बीचोंबीच या आस-पास की पहाड़ियों पर पाए जाते हैं। यहाँ पेड़ छितरे हुए से लगे होते हैं।

4. कच्छ या गरान (मेनग्रूव्ज फॉरेस्ट)- इस प्रकार के जंगल समुद्री जल के आस-पास पनपता है। पश्चिम बंगाल का सुंदरबन इसका उदाहरण है। ये जंगल भी काफी घना होता है लेकिन इसमें ज्यादातर वो पेड़-पौधे उगते हैं तो नमकीन पानी में अपने को जीवित बनाए रख सकते हैं।

भारत के कुछ सबसे घने जंगलों वाले इलाके (कुल भू-भाग के प्रतिशत में)
1. मिजोरम : 87 प्रतिशत
2. अंडमान और निकोबार : 84 प्रतिशत
3. नागालैण्ड : 82 प्रतिशत
4. मणिपुर : 77 प्रतिशत
5. मेघालय : 75 प्रतिशत
6. लक्ष्‌यद्वीप : 71 प्रतिशत
7. अरुणाचल प्रदेश : 68 प्रतिशत
8. सिक्किम : 45 प्रतिशत
9. उत्तांचल : 45 प्रतिशत
10. केरल : 40 प्रतिशत

भारत के कुछ सबसे कम जंगलों वाले इलाके (कुल भू-भाग के प्रतिशत में)
1. हरियाणा : 3 प्रतिशत
2. पंजाब : 3 प्रतिशत
3. राजस्थान : 4 प्रतिशत
4. बिहार : 6 प्रतिशत
5. उत्तर प्रदेश : 6 प्रतिशत
6. दमन और दीव : 7 प्रतिशत
7. गुजरात : 7 प्रतिशत
8. पोंडेचरी : 8 प्रतिशत
9. जम्मू-कश्मीर : 10 प्रतिशत
10. दिल्ली : 11 प्रतिशत

June 03, 2009

कुछ सूखती-चटकती-तड़कती धरती के बारे में भी पढ़िए

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June 02, 2009

भारतीयों पर आस्ट्रेलिया में हमला..आखिर क्यों..??

दुनिया से रंगभेद कभी समाप्त नहीं हो सकता

मित्रों, आज का विषय मन को टीस मारने वाला है। मन को चुभने वाला है। मन तो करता है कि इन पूरे दो करोड़ आस्ट्रेलियाईयों को चुन-चुन कर जूते मारूँ। घूँसे नहीं चाँटे मारूँ (क्योंकि चाँटा खाकर आदमी घूँसे के बजाए ज्यादा बेइज्जती महसूस करता है) लेकिन जब मैं दुनिया के परिप्रेक्ष्य में इस घटना को देखता हूँ तो लगता है कि मानव की मिट्टी ही काली है। वो यह सब किए बगैर रह ही नहीं सकता। दुनिया से रंगभेद कभी समाप्त नहीं हो सकता।

मित्रों, जब आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की पिटाई, उनपर जानलेवा हमले और पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ्तार किए जाने की खबर आई तो एक बारगी तो खून खौल उठा। लगा कि धिक्कार है हमारे देश की नपुंसक सरकार पर, जो फिर से एक बार चुप बैठी है। फिर मन को संभाला कि भाई सचिन, ज्यादा नाराज नहीं होते, जब पता है कि मुंबई में 10 आतंकी हमारे घर में घुसकर हमारी पेंट उतारकर चले गए और हम तब कुछ नहीं कर पाए तो अब क्या कर लेंगे क्योंकि इस बार तो मामला दूर देश का है, सात समुन्दर पार का है। मैंने सोचा कि मुंबई घटना के समय मैंने भारत सरकार को बहुत कोसा था। लेकिन जनता ने उस शांत और शालीन सरकार (?) को दोबारा सत्ता में आने का मौका दिया है तो इस बार मैं सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलूँगा। क्योंकि मनमोहन सिंह और सोनिया पर देश की जनता ने विश्वास जता दिया है। तो ये सरकार महान (?) साबित हो चुकी है इसलिए इस बार आपकी, हमारी, संसार की और मानव जाति की बात होगी।

दोस्तों, आस्ट्रेलिया कैसे बना और क्यों बना इसे बताने की जरूरत नहीं, ये तो ब्रिटेन वाले हर एशेज टूरनामेंट के पहले खुद ही बता देते हैं। मेरी तरफ से सिर्फ इतना ही, कि वो गुंडे और मवालियों से बना देश है और धन-संपदा आने के बाद वहाँ के लोगों का दिमाग काफी पहले खराब हो गया था। आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम का घमंडी व्यवहार यह बताने के लिए काफी है और अब इन घटनाओं से यह भी सिद्ध हो गया है कि रंगभेद की टिप्पणी करने में हम भारतीय आगे हैं या वो आस्ट्रेलियाई (मैंने हरभजन और साइमंड्स मामले में यह कहा)। खैर, आस्ट्रेलिया में यह सब जो हो रहा है इसके लिए मैं किसे दोष दूँ इस बारे में फिलहाल असमंजस में हूँ। मानव जाति है ही ऐसी, कि उसे जब भी मौका मिलता है वो अपने सामने वाले को ना सिर्फ नीचा दिखाने की कोशिश करती है बल्कि खाने को भी दौड़ती है। पूरे संसार में इसके उदाहरण हैं। रंगभेद एक शालीन शब्द है, लेकिन जातिभेद और धर्मभेद को भी मैं इसी संदर्भ में देखता हूँ द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को सिर्फ इसी धर्मभेद के नाम पर मरवा दिया था। जिस अमेरिका की आज पूरे संसार में तूती बोलती है उसने अपने यहाँ के मूल निवासी करोड़ों रेड इंडियंस को मरवा-गड़वा दिया और आज उनकी संख्या घटकर 15 लाख के आस-पास पहुँच गई है। इसी प्रकार अफ्रीकी मूल के जो लोग अमेरिका में रहते हैं उनमें से एक भले ही अमेरिका का राष्ट्रपति बन गया हो लेकिन आज भी वो वहाँ दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं। उन्हें आपराधिक प्रवृत्ति वाला ही माना जाता है।

ब्रिटेन ने एक समय पूरे संसार पर राज किया। आज वो भले ही एक कोने में सिमट कर रह गया हो लेकिन उसने जिस बर्बरता के साथ उसने भारत में भारतीयों को कुचला उस बारे में आप, हम और हमारी पहले की पाँच पीढ़ियाँ भी जानती हैं। दोस्तों, पूरे संसार में रंगभेद के उदाहरण बिखरे हुए हैं। दक्षिण अफ्रीका में भी इसने लंबे समय तक पाँव पसार कर रखा। आज भी यह वहाँ देखने को मिल जाता है जब आपको स्थानीय लोग गोरे लोगों के नीचे दबे हुए नजर आ जाते हैं। अब मैं बात करता हूँ हम शालीन भारतीयों की। हम सब तरफ से सिर्फ पिटते-कुटते ही नजर आते हैं। लेकिन यकीन मानिए कि भारत ने जिस प्रकार से भेद किया वैसा तो संसार में शायद कहीं हुआ ही ना हो। इंसान की प्रवृत्ति में ही भेद है। भारत की वर्णव्यवस्था ने सबसे ज्यादा सत्यानाश किया। हमने कई शताब्दियों तक दलितों को कुचला, उनकी ऐसी-तैसी कर डाली...हमारे बाप-दादाओं ने उन्हें इतना परेशान करके रखा कि वो मोहल्ले के कुएँ की तरफ भी रुख नहीं कर पाते थे। कोई छू जाए तो उसे जिंदा जला दिया जाता था। उनपर इतने जुल्म हुए कि आज वे तंग आकर मायावती जैसी नेता के पीछे खड़े हैं। अंबेडकर के कहने पर उनमें से कईयों ने हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्धधर्म को अपनाया। हम लोगों ने उन्हें बहुत तंग किया जबकि वो सब तो हमारे भाई ही थे, इसी देश के और हमारे ही रंग के....!!!!!!!!!

मित्रों, आधुनिक संसार में रंगभेद जघन्य अपराध है। लेकिन क्या हम ही आपस में रंगभेद नहीं करते....आज भी हमारे मन में गोरी चमड़ी के प्रति खौफ, प्रेम, आकर्षण और रहस्य का मिलाजुला मिश्रण नहीं है..??
हर भारतीय आज विदेश में जाकर बसना चाहता है। मेरे स्कूल के ज्यादातर सहपाठी आज विदेशों में हैं। उन्हें वहाँ जाकर फर्क होता है। विदेशों में पढ़ने जाने के लिए भी छात्र मरे जाते हैं। उनके माता-पिता कहीं से भी लाखों रुपए का कर्ज लेकर उन्हें वहाँ भेजते हैं। ये छात्र वहाँ जाकर मन लगाकर मेहनत भी करते हैं। सफल होते हैं और अपने पेशे में नाम करते हैं। यहाँ तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही स्थानीय लोगों को ये लगने लगता है कि ये हमारी रोटी में से हिस्सा ले रहा है उनके मन में रंगभेद जाग जाता है। रंगभेद की फिलहाल सबसे बड़ी दी जाने वाली मिसाल बराक ओबामा ने भी अपने कार्यकाल के कुछ सबसे पहले निर्णयों में से एक यह किया कि भारत को आईटी क्षेत्र में दिया जाने वाला काम बंद करवा दिया। हमारे देश के हजारों नौजवान बेघर हो गए। तो आपको क्या लगा कि बराक ओबामा या अमेरिका रंगभेद में विश्वास नहीं करता है..??

भेद तो इंसान के मन में होता है। उसका रंग फिर भले ही कुछ भी क्यों ना हो। अगर आपके पड़ौसी के पास अचानक कहीं से रुपया आ जाए तो आप देखेंगे और महसूस करेंगे कि उसने भी अचानक ही रंग बदल लिया है और आप रंगभेद के शिकार हो गए हैं। उसकी आपसे बात करनी की स्टाइल तक बदल जाएगी। वो आपको घास डालना बंद कर देगा और उसे लगने लगेगा कि बस अब उसने दुनिया जीत ली। तो रंगभेद असुरक्षा या अतिसुरक्षा दोनों ही भावनाओं से पैदा होता है। आस्ट्रेलिया में किया जाने वाला रंगभेद असुरक्षा की भावना वाला है जबकि भारत में यह अतिसुरक्षा की वजह से जन्म लेता है। संसार से रंगभेद का खत्म होना मुश्किल है दोस्तों, कभी आप तो कभी हम इसका शिकार बनते हैं या फिर दूसरे को शिकार बनाते हैं।

आपका ही सचिन.......।

May 29, 2009

ये कैसी मंदी..??

भारत में झूठ तथा फरेब सबसे ज्यादा है

दोस्तों, आज का मुद्दा गंभीर है। आपसे और मुझसे ये सीधे ही जुड़ा हुआ है। जो दोस्त मुझे दूर देश रहकर पढ़ते हैं उनके लिए भी यह प्रासंगिक रहेगा लेकिन भारतीय साथियों के मन की कुछ बातें मैं कहूँगा। यह सही है कि इस मुद्दे पर मुझे बहुत पहले ही लिख डालना था लेकिन हर चीज की एक अति होती है और भारत में मुझे यह अति अब होती हुई दिखाई दे रही है। इसलिए मैं अपने कुछ विचार आप लोगों के समक्ष रखूँगा। जाहिर है टॉपिक आप समझ ही गए होंगे और यहाँ बात अब मंदी पर होने वाली है। वैश्विक कम और भारतीय ज्यादा...तो साथ में पढ़िए।

दोस्तों, आज अपने ही अखबार में छपने वाली एक खबर पढ़ रहा था। इसमें भारतीय रिटेल समूह के किंग किशोर बियाणी का बयान था। वे कह रहे हैं कि भारत में मंदी नहीं है, सिर्फ तेजी कम हुई है। मतलब लोगों ने खर्च करना कम कर दिया है इस वजह से मंदी दिखाई दे रही है। अब आप किशोर बियाणी के बारे में तो जानते ही होंगे। इन्होंने देश में बिग बाजार, पेंटालून और ई-जोन जैसी रिटोल चेन की स्थापना की। अब ये देश भर में सेन्ट्रल मॉल के नाम से आलीशान मॉल्स की श्रृंखला खोलने में व्यस्त हैं। काफी शानदार मॉल्स हैं ये। एक इंदौर में भी खुला है। सबसे बड़ी पहचान कि बियाणी साहब अरबपति ग्रुप, फ्यूचर ग्रुप के सीईओ हैं। तो दोस्तों, मैंने फिलहाल बियाणी जी के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है लेकिन मेरा खुद का भी यही मानना है कि देश में कोई मंदी नहीं है और जो लोग अपने कर्मचारियों के वेतन में इस मंदी के नाम पर कटौती कर रहे हैं या उन्हें नौकरी से निकाल रहे हैं ऐसी सभी लोग और कंपनियाँ धूर्त हैं।

मित्रों, भारत के संदर्भ में मंदी को समझना चाहिए। जिस आईटी सेक्टर में मंदी की सबसे बड़ी मार हुई उसका भारतीय जीडीपी में मात्र 5 प्रतिशत का हिस्सा है। 20 प्रतिशत हिस्सा तो कृषि क्षेत्र का है। और अगर इंद्र देवता की इस बार मेहरबानी हुई और देश में बारिश अच्छी हो गई तो ये 20 प्रतिशत हिस्सा तो आप मजबूत समझिए। अब बात उसकी करते हैं जिससे मंदी की शुरूआत हुई। यानी भारतीय शेयर बाजार की। मैं पिछले पाँच साल से भारतीय शेयर बाजार को वॉच कर रहा हूँ। बहुत पहले तो यह (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) 3-4 हजार के अंक के आस-पास ही झूलता रहता था। फिर ये धीरे-धीरे सरक-सरककर 10 हजार के अंक तक पहुँचा। और उसके बाद यह घोड़े की चाल से दौड़ने लगा। हर दिन कुछ सैंकड़ा का उछाल और बाद में तो एक-डेढ़ हजार भी आसानी से भागता रहता था। तब किसी ने सोचा कि ये इतना क्यों उछाल मार रहा है। ये नकली तेजी थी। फिर अचानक मंदी आ गई। ये 21 हजार से गिरकर 7 हजार के अंक तक पहुँच गया। हाँ, उस समय शेयर बाजार में मंदी थी। लेकिन आप देखिए कि पिछले कुछ महीनों में यह सफर करता हुआ फिर से 14500 तक के आँकड़े तक पहुँच गया। यानी जो इसकी असलियत थी या कहें ये डिसर्व करता था वहाँ तक यह फिर पहुँच गया। दिवाली तक यह 17 हजार के आँकड़े तक पहुँच जाएगा ऐसे अनुमान हैं। कुल मिलाकर ये तथाकथित मंदी भारत से स्वतः दूर हो रही है और वैसे भी शेयर बाजार कोई पैमाना नहीं होता। लेकिन मैं इस मंदी के दौर में एक क्षेत्र विशेष की बात करता हूँ।

मंदी के दौर में मैं मीडिया को भी इसी मामले में रोता हुआ सुनता रहता हूँ। यहाँ मैंने मीडिया की बात इसलिए छेड़ी क्योंकि मैं इसी लाइन से आता हूँ। तो मीडिया ने भी भारी छंटनियाँ की हैं। बहुत सारे चैनल और अखबार के एडिशन बंद हो गए इसी मंदी की दुहाई देकर। लेकिन मैं जब भी टीवी चैनलों को देखता हूँ या थोड़े बहुत भी चलने वाले अखबार देखता हूँ तो वो मुझे विज्ञापनों से पूरी तरह से रंगे हुए नजर आते हैं। इतने-इतने विज्ञापन की मन ही ऊब जाए। कई बार तो मैं इन विज्ञापनों से तंग आकर हिन्दी टीवी न्यूज चैनल बदलकर अंतरराष्ट्रीय अंग्रेजी न्यूज चैनलों पर चला जाता हूँ। लेकिन मुझे तब एकदम से आश्चर्य होता है जब मैं वहाँ तस्वीर का दूसरा रुख देखता हूँ। मंदी ने सबसे ज्यादा अपनी चपेट में योरप और अमेरिका को ही लिया है। बावजूद इसके आप कभी भी बीबीसी या सीएनएन पर पागलों की तरह विज्ञापनों की बाढ़ को नहीं पाओगे। तो क्या कारण है कि हम लोग रोए जा रहे हैं और वो लोग स्थिर है। किसी भी भारतीय न्यूज चैनल या अखबार की क्षमताएँ विदेशियों के सामने कुछ भी नहीं हैं। उन चैनलों के संवाददाता सारे संसार में तैनात हैं, जबरदस्त संसाधन हैं तो फिर वे ये सब कैसे मैनेज कर रहे हैं और हम क्यों नहीं कर पा रहे या उनसे यह सब क्यों नहीं सीख पा रहे। आपने सुना होगा कि गूगल संसार की सबसे तेज बढ़ती हुई कंपनियों में से एक है। बीच में चर्चा चली थी कि वो न्यूयार्क टाईम्स अखबार समूह को खरीदने जा रही है। बाद में खुद गूगल ने उसका खंडन कर दिया था लेकिन आपने कभी गूगल की किसी सुविधा पर विज्ञापनों की बाढ़ देखी? मैं खुद गूगल की तमाम सेवाओं का उपयोग करता हूँ लेकिन मैंने कभी वहाँ झिलाऊ विज्ञापनों को नहीं झेला। विकिपीडिया मेरे ज्ञान में हमेशा वृद्धि करता रहता है। मेरे लिए वो ज्ञान का कोष है। आपने भी उसका उपयोग किया होगा। क्या कभी आपने उसमें विज्ञापनों की भरमार देखी।

इसी प्रकार आप विदेशी नामचीन अखबारों को उठाकर देखिए...वे विज्ञापनों के लिए उस प्रकार से पागल नहीं दिखेंगे जैसे ये हिन्दी या भारतीय अंग्रेजी के अखबार दिखते हैं। विदेशी अखबारों में पढ़ने के लिए बहुत कुछ होगा जबकि कीमत कम होगी। वहीं हमारे यहाँ मामला उल्टा है। अखबारों को अब आप कुछ ही मिनट में फैंक देते हैं। हमारे देश में खबरों के लिए अखबार शुरू हुए थे और समाजसेवा के लिए स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ या कहें गैर सरकारी संगठन) लेकिन ये दोनों ही अपने रास्ते से भटक गए। आज अखबार खबरों को छोड़कर विज्ञापन के पीछे लगे हुए हैं और एनजीओ समाजसेवा को छोड़कर फंड कलेक्टिंग के पीछे लगी हुई है। कम से कम भारत में तो ये अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं। आज कोई अखबार खुलता है तो पहले वहाँ विज्ञापनों की जुगाड़ की बात होती है। पन्ने विज्ञापनों से भरे होते हैं और बची जगह पर खबरें लग जाती हैं। हद तो तब है, जब उसके बाद भी मंदी की बातें होती हैं। अगर ऐसा ही है तो अखबार मालिकों को पहले ये देखना चाहिए कि विदेशी अखबार अपने पाठकों को विज्ञापनों से ज्यादा खबर कैसे दे पा रहे हैं। मैंने कई विदेशी कंपनियों खासकर मीडिया कंपनियों को भारतीय कंपनियों से ज्यादा ईमानदार पाया। अगर उन्हें भ्रष्ट होना भी पड़ता हो तो वो एकाध बार ही ऐसा करती हैं नहीं तो ज्यादातर वो ईमानदारी से अपना डंका संसार में बजाती हैं। मुझे नहीं लगता कि वैश्विक धंधे में इतनी कम भूमिका रखने वाला भारत मंदी से इतना ग्रस्त है कि अपने यहाँ काम करने वाले लोगों को उसे खाना पड़ रहा है। हमें धंधे के साथ जीवन में भी ईमानदार होना सीखना होगा। नहीं तो इस देश में एक व्यक्ति तो रईस होता चला जाएगा जबकि दूसरा सिर्फ गरीब। इस चीज की परिणिती अच्छी नहीं होगी। ये भारतीय व्यापारियों और उद्योगों के मालिकों को समझना होगा। बाकी आने वाला समय ही बताएगा।

आपका ही सचिन...।

May 28, 2009

राहुल के युवा चेहरों का गणित..!!

हम और आप कभी नहीं हो सकते इन युवा चेहरों में

दोस्तों, आज मनमोहन मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट मंत्रिमंडल में शामिल हैं। पीए संगमा की बेटी अगाथा संगमा भी शामिल हैं। ओमर अब्दुल्ला दिखे नहीं क्योंकि वे पहले ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन चुके हैं और राहुल गाँधी भी नहीं दिखे क्योंकि वे सीधे ही प्रधानमंत्री बनेंगे....क्योंकि गाँधी परिवार में किसी को भी प्रधानमंत्री से नीचे का पद सक्रिय राजनीति में स्वीकार नहीं है। अगर विश्वास ना हो तो खुद जाँच कर देख लीजिए।

दोस्तों, यहाँ मेरा विषय दूसरा है। इस बार कांग्रेस ने बहुत ढोल पीटे कि कांग्रेस के पास युवा चेहरे हैं जबकि भाजपा जो एक समय जवाँ पार्टी थी, वो अब बुढ़ा रही है, उसके पास कोई भी सेकण्ड लाइन नहीं है और ना ही कोई चमकदार युवा नेता है जैसे कि कांग्रेस के पास हैं, और जिनका की मैंने ऊपर उल्लेख किया। इन युवाओं चेहरों या कहें नेताओं को राहुल की किचन कैबीनेट कहा गया। राहुल पिछले पाँच सालों की तरह इस बार भी संगठन को मजबूत करने का कार्य करेंगे। हाँ अगर इस बार मनमोहन सिंह को कुछ हो गया (भगवान ऐसा ना करे लेकिन उनकी बायपास सर्जरी हुई है इसलिए कह दिया) तो राहुल इसी टर्म में प्रधानमंत्री बन सकते हैं। वैसे उनका 2014 के आम चुनावों के बाद प्रधानमंत्री बनने का है लेकिन मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस लगातार तीसरी बार रिपीट करेगी। वैसे राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन फिर भी सोनिया गाँधी इतनी बड़ी रिस्क नहीं लेंगी और इसी टर्म में कभी ना कभी राहुल को प्रधानमंत्री बनवाएँगी क्योंकि 2014 का टारगेट ये सोच कर रखा गया था कि इस बार कांग्रेस सत्ता में नहीं आ पाएगी। ये तो उसका तुक्का लग गया और सोनिया इस बात को समझती हैं, तो आप देखिएगा कि 2011 तक राहुल प्रधानमंत्री बन सकते हैं और 2014 का आम चुनाव जनता को राहुल का चेहरा दिखाकर ही लड़ा जाएगा।

मित्रों, असल में मेरा मुद्दा यह भी नहीं था, सबसे पहली बात कि लोग मुझे कांग्रेस के प्रति बहुत अधिक बायस ना समझें। कई मामलों में मैं भी राहुल का प्रशंसक हूँ और मानता हूँ कि उन्होंने इस बार कई नए प्रयोग किए जिस वजह से उन्हें सफलता मिली। इतना ही नहीं उन्होंने कई ऐसी बातों को भी स्वीकारा जो उन्हें नहीं स्वीकारनी थीं, मसलन उन्होंने मान लिया कि वो परिवारवाद की पैदाइश हैं और कांग्रेस में इतने बड़े पद पर इसलिए ही हैं। लेकिन मैं राहुल से ज्यादा यहाँ उनकी युवा टीम या कहें युवा चेहरों के बारे में बात करना चाहता हूँ। राहुल के करीबी युवाओं के बारे में यूँ तो मैं बहुत कुछ जानता हूँ लेकिन थोड़े में बस इतना ही बताना चाहता हूँ कि राहुल की किचन कैबीनेट में या कांग्रेस के मंत्रिमंडल में हम और आप जैसों के लिए कोई जगह नहीं है। वहाँ एक भी ऐसा चेहरा नहीं है जो अपनी दम पर वहाँ पहुँचा हो। सब के सब बाप कमाई पर वहाँ राष्ट्रपति के बगल में खड़े होकर शपथ पढ़ रहे थे। मुझे इस आँकड़ें पर भी गहन क्षोभ हुआ कि इस बार आधे से ज्यादा सांसद करोड़पति हैं और युवा चेहरे तो सभी करोड़पति हैं। वैसे तो मैं मानता हूँ कि सभी सांसद करोड़पति हैं और अपनी आय को बहुत कम करके घोषित करते हैं लेकिन मेरा सिर्फ यह प्रश्न है कि अगर मैं राजनीति में जाना चाहूँ तो मुझे पहले क्या करना होगा। करोड़पति बनना होगा या माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, फारुख अब्दुल्ला, जितेन्द्र प्रसाद या मुरली देवड़ा जैसा बाप ढूँढना होगा। मैं जानना चाहता हूँ कि इन तथाकथित युवा चेहरों ने क्या तोप मारी है कि हम क्यों इनसे इंप्रेस होकर इन्हें जिताएँ और संसद में पहुँचाएँ। माफ करना, यहाँ मैं बात उन जाहिलों की नहीं कर रहा हूँ जो परिवार या शक्ल देखकर अपना वोट देते हैं। जाहिर है संसार का सबसे परिपक्व लोकतंत्र मैं भारत को नहीं अमेरिका को मानता हूँ, जिसने हाल ही में एक ऐसे युवा बराक ओबामा को देश का राष्ट्रपति बना दिया जो वाकई पिछले दशक तक राजनीति में ही नहीं आया था। या फिर सड़कों पर भटकने वाले एक युवा लेकिन जुझारू युवा नेता बिल क्लिंटन को उस देश ने संसार का सिरमौर बना दिया था।

दोस्तों, मेरे शहर इंदौर में राहुल ने एक युवा को विधानसभा का टिकट दे दिया। उसने बहुत प्रोपेगण्डा किया कि राहुल ने उसकी क्षमताओं को देखकर और परखकर उसे टिकट दिया। जब मैंने उस युवा को एक बार अपना चुनाव प्रचार करते देखा तो वह मित्सीबुशी की पजेरो कार में घूम रहा था। वो कार उसी की थी। अब बताईए एक युवा जो 20-25 लाख की कार से चल रहा है उसे टिकट देकर राहुल ने क्या जताया। बाद में जब उस युवा ने अपनी संपत्ति घोषित की तो वो भी करोड़ों में थी। हालांकि बाद में वो युवा विधानसभा का चुनाव हार गया लेकिन मेरी नजर में इतना तय हो गया है कि आप कैसे भी युवा हों, राहुल के मार्फत आना चाहते हों या सोनिया के। अगर आप देश की संसद की ओर देख रहे हैं तो सर्वप्रथम करोड़पति हो जाइए, नहीं तो माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, फारुख अब्दुल्ला, जितेन्द्र प्रसाद या मुरली देवड़ा जैसे बाप लाइए और बाद में फिर आगे की जुगाड़ कीजिए....और अगर आपके पास यह सब नहीं है तो माफ कीजिए, लाइन में से हट जाइए, और थोड़ी सी हवा आने दीजिए....।

आपका ही सचिन.....।

May 27, 2009

आपके और आपके बच्चों के लिए रणथम्भौर की सैर

एक बार जाकर देखिए जरा, मजा आ जाएगा
लेख को पढ़ने के लिए दी गई दोनों इमेज (फोटो) पर क्लिक कीजिए.



May 26, 2009

प्रभाकरण के मरने पर अफसोस क्यों..??

पिछले दस दिनों में कुछ महत्वपूर्ण घटना हुईं जिनका मैं चाहते हुए भी उल्लेख नहीं कर पाया। कई बार काम की व्यस्तता इतनी ज्यादा होती है कि आप अपने सामने कम्प्यूटर को रखे देखते रहते हैं और कुछ नहीं कर पाते। यानी पंगु हो जाते हैं। समय निकालना मुश्किल हो जाता है। लेकिन आज मैंने निकाल ही लिया दोस्तों से अपनी मन की बात कहने के लिए समय। लेकिन उन सब घटनाओं में से यहाँ मैं सिर्फ एक घटना के ऊपर आपसे बात करूँगा।

कुछ दिनों पहले मैंने प्रभाकरण का वो चित्र देखा जिसमें उसके भेजे को चीरकर निकली गोली का निशान बना हुआ था। उस फोटो के आसपास कई खबरों को मैंने देखा। कईयों को मैंने सजा (डेकोरेट) हुआ भी पाया। इनमें से कई को तो मैंने ही सजाया था अपने अखबार के पन्ने पर। मेरा मन इस दौरान काफी कुछ सोच रहा था। मैं बचपन से प्रभाकरण का नाम सुन रहा था। मुझे लगता था कि वो हीरो है। तमिलों के लिए लड़ रहा है जो मूल रूप से हिन्दू हैं और हमारे देश से ही उनकी उपज है। फिर जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो पता चला कि हमारे देश के एक युवा प्रधानमंत्री (जो वाकई कई मायनों में अच्छे थे) राजीव गाँधी को इस प्रभाकरण ने मरवा दिया। मुझे इस प्रभाकरण से चिढ़ हो गई। लेकिन मैं खबरों में लगातार पढ़ता रहा कि वो सिंहलियों के खिलाफ संघर्षरत तमिलों का सर्वमान्य नेता है और उनके अत्याचार के विरोध में डटा हुआ है। लेकिन मेरी बुद्धि फिर भी इतनी कार्य नहीं करती थी कि मैं ये सोच पाऊँ कि मैं प्रभाकरण से संवेदना क्यों रखूँ। एक भारतीय होने के नाते या एक हिन्दू होने के नाते। फिर मैंने तमिलनाडु के काला चश्मा पहनने वाले उस पागल मुख्यमंत्री एम करुणानिधी के बयानों पर गौर करना शुरू किया। वो टुकड़ों-टुकड़ों में जहर उगलता है। वो हिन्दी और हिन्दूओं का विरोध करता है। वह कहता है कि क्या राम कोई इंजीनियर थे जो उन्होंने रामसेतु का निर्माण करा दिया। और अगर वाकई इंजीनियर थे तो कौन से इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्हें डिग्री मिली थी? कई बार वो बोला कि अगर हिम्मत है तो तमिलनाडु में आकर हिन्दी बोलकर दिखाओ। मैं चकरा गया। सोचा कि ये तो हमारे ही देश और धर्म का है फिर ये ऐसी बातें क्यों कर रहा है? लेकिन वो असल में द्रविड़ है और बकौल करुणानिधी उसका हमारे धर्म से और हमारे देवताओं से कोई ताल्लुक नहीं। खैर, ठीक है भाई...

जिस प्रकार प्रभाकरण श्रीलंका में अलग से तमिल-ईलम की माँग करता आ रहा था ठीक उसी प्रकार से अलगाववादी बयान करुणानिधी और उसके मंत्रियों के भी आते हैं। एक ने इसी झोंक में कह दिया कि प्रभाकरण मारा गया तो भारत में खून की नदियों बह जाएँगी। कमाल है। हमारा देश और यहाँ की सरकार नाकारा है., क्यों???...कोई कहीं भी मरे यहाँ रहने वाले पहले पागल हो जाते हैं। पंजाब और हरियाणा में सिख ग्रंथी के मरने के बाद सिखों ने जो किया मैं उसका खुले मंच से विरोध करता हूँ। आखिर हमारे देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की उनकी हिम्मत कैसे हुई। वो संपत्ति सार्वजनिक थी किसी के बाप की नहीं थी। इसी प्रकार मैं डेनमार्क में नबी मोहम्मद के ऊपर बने कार्टून के विरोध में भारत में मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा और विरोध का भी खुले तौर पर सार्वजनिक मंच से विरोध करता हूँ। उनके द्वारा मचाया गया दंगा गलत था और सार्वजनिक संपत्ति को पहुँचाया गया नुकसान भी गलत था। इन्हीं दोनों प्रकार की घटनाओं को मैं तमिलनाडु के संदर्भ में भी देखता हूँ कि जिन द्रमुक नेताओं ने ऐसी गलतबयानी की उन्हें उसी प्रकार उनकी धोती उतरवाकर पिटवाया जाना चाहिए जैसे जयललिता ने इस करुणानिधी को पिटवाया था। आखिर क्यों हम ऐसे किसी नेता को स्वीकार करें जिसे इस देश की राष्ट्रभाषा, सर्वमान्य भगवान और सर्वप्रथम इस देश और यहाँ के लोगों से प्यार नहीं है। मैं धिक्कारता हूँ करुणानिधी को, उसके मंत्रियों को और सबसे बड़े उस प्रभाकरण को जो कुत्ते की मौत मरा क्योंकि उसने हमारे देश का एक युवा तथा स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री छीन लिया था। हालांकि हम भारतीय किस्मत को मानने वाले हैं और हम प्रभाकरण को कभी नहीं पकड़ सकते थे वो तो श्रीलंकाई सेना ने उसे मार दिया तो हम खुश हो रहे हैं। लेकिन कांग्रेस ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखी और धीरे से यह बतला दिया कि प्रभाकरण से मरने पर उसे कतई दुख नहीं है। इस मामले में मैं कांग्रेस के साथ हूँ।

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे कैसे भी हों लेकिन वो बाहर कहीं से जब भी आते हैं तो विमान से उतरने के बाद सबसे पहले घुटनों के बल बैठकर अपनी मातृभूमि को प्रणाम करते हैं। उनकी इस भावना का मैं सम्मान करता हूँ और इस बात का भी कि उन्होंने दिखा दिया है कि आंतकवाद से कैसे निपटा जाता है। 26 साल पुराने आतंकवाद को उन्होंने कुछ महीनों में ही निपटा दिया और एक हम हैं कि आतंकवादियों का सफाया करने से पहले कई सारे गणित करने में उलझे रहते हैं, मसलन फलाँ धर्म के लोगों को तो बुरा नहीं लग जाएगा या हमारी फलाँ सहयोगी राजनीतिक पार्टी को तो बुरा नहीं लग जाएगा। भारत सरकार को महिन्द्रा राजपक्षे से कुछ सीखना चाहिए और यह भी कि जब आप कुछ करने की ठान लें तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको रोक नहीं सकती। श्रीलंका तो भारत के मुकाबले बहुत छोटा है लेकिन उसने असीम दृढ़ता का परिचय दिया है। हमें उससे कुछ सीख लेनी होगी। मैं प्रभाकरण के मरने से खुश हूँ।

आपका ही सचिन......।

May 16, 2009

बोलो सोनिया मैया की जय!

दोस्तों, मेरे साथ बोलो सोनिया मैया की जय, गाँधी परिवार की जय...सब लोग अपने हाथ ऊँचे करें और बोलें ऊँ..ssssss

दोस्तों, यूपीए क्लीयर तौर पर आ गई है। उसे ना मायावती की जरूरत है, ना मुलायम की और ना लेफ्ट की...आडवाणी, नरेन्द्र मोदी, अरुण जेटली सब एक तरफ गए। ....कांग्रेस को समर्थन करने वाले सब खुश हैं लेकिन मैं चिंतित हूँ कि कहीं पेट्रोल, दाल, चावल, आटा कहीं 100 रुपए लीटर या किलो ना हो जाएँ, चिदंबरम-मनमोहन कुछ और टैक्स ना लाद दें, लेकिन गलती हमारी ही है.....कम वोट प्रतिशत लगभग 50 फीसदी (भारत भर में) से ही समझ आ गया था कि कांग्रेस को फायदा मिलेगा, बुद्धिजीवी लोग कमरों में बैठकर बौद्धिक मैथुन (मंथन नहीं) करते रहे और थैले में बम फोड़ते रहे वहीं दूसरी ओर धूप में लंबी कतारों में वोट देकर आया देश का निचला तबका फिर से गाँधी-नेहरू परिवार की जय कर गया। आखिर हो भी क्यों ना, हमने बरसों गुलामी में बिताए, राजे-रजवाड़ों के पैरों तले रहे और कई शताब्दियों तक उनके शासन को ही स्वीकारा। उस आदत की जीत हुई।

दोस्तों, फिर से मेरे साथ बोलो, गाँधी-परिवार की जय...सोनिया मैया की जय..जय...जय हो।


- सचिन